एक नाय दोन नाय राडे केले तीन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग
अण्णाकी पोरगी क्या माल है ढासू
तू है मेरी सपना और में तेरा वासू
ईडली डोसा खाके... साला मर गया वासू
पिच्चर देखे के रोई उसकी आंखों में आसू
अण्णा को समजा कीया उसने बडा सीन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग...
मासुम लगती थी उसका नाम था सखू
बाप उसका गुंडा साली खानदानी डाकू
सोचा केले बाहो में उसको थोडसा चखू
हात लगाया उसको साली निकाली चाकू
पुंगी करके मेरी .... उसने बजाई बीन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग...
बाहाद्दुरकी बेहेन मुझे लगती है अच्छी
जागती या सोती है मालुम नई सच्ची
भात साला कच्चा नी भाजी पन कच्ची
छिपकली खिलाई मुझको बोलके मच्छी
लगताथा नेपाली, साला ये तो निकला चिन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग...
नाव तिच रेखा पण दिसते माधुरी
लग्न झालं तिच नी राहीली स्वप्न अधुरी
मामा म्हणती मला... तिची पोरं अन पोरी
भाई उसका अब में, और वो बेहेन है मेरी
एक नाय दोन नाय भाचे-भाची तिन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग...
एक नाय दोन नाय राडे केले तीन
लडकी पटाने मे साला कितनी है धतींग
-सत्यजित.
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on Friday, 1 August 2008
at 10:57:00 AM
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सत्या भाईच्या कविता
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